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तुम्हारी कल्पना

कमाल है इसका डुबना भी न ,
जो एक रंग खूबसूरती का दे जाता है
ठीक तुम्हारी मुस्कान की तरह न,
और फिर भी कहती हो कि मैं(स्त्री) कुछ भी नही।

कमाल है इसके आस पास भी खूबसूरती दे जाती हो,
लालिमा, सुंदर दृश्य और मनमोहक छटा
और फिर भी कहती हो कि मैं(स्त्री) कुछ भी नही।

कमाल है इतराना तेरा बादलों के बीच मे,
बारिशों के साथ मिलकर इंद्रधनुष का निर्माण तेरा,
और फिर भी कहती हो कि मैं (स्त्री) कुछ भी नहीं।

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