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साल की आखिरी चाय



हम उस वक्त मिले जब मुझे प्यार की ना तो जरूरत थी 

नहीं प्यार से नफरत 

लेकिन हमारी स्टोरी कुछ वैसी है 

कैजुअल फ्रेंड्स थे 

फिर क्लोज फ्रेंड्स हो गए 

बेस्ट फ्रेंड्स हो गए 

फिर

लव स्टार्ट हो गया 

यह किस्सा साल की आखरी शाम का है

 हमारी दोस्ती को काफ़ी वक्त बीत चुका था 

साल की आखिरी शाम जो सर्द थी 

पर गुलाबी भी

 हम कोचिंग के बाहर खड़े थे, 

क्लास शुरू होने में पंद्रह मिनट बचे थे 


मेरे हाथ हमेशा की तरह ठंडे और बिल्कुल सुन्न थे ।


"चाय पियेगी... चलते चलते बस यूं ही पूछा उसने

हां... 

मैंने फट से जवाब दिया 

जैसे कि मैं बस उसके पूछने के इंतजार में थी 

हम एक दूसरे के सामने बैठे हैं अदरक के साथ चाय की महक हवा में घुलने लगी 

"अरे जल्दी कर दो भैया"

... उसने मेरे हाथ अपनी गर्म हथेलियों में थामते हुए कहा ।


मुझे कोई जल्दी नहीं थी ।

बैकग्राउंड में बज रही गाने ने 

"सोनिए हीरिए तेरी याद औंदिए, सीने विच तड़पता है दिल जान जांदिए"

उस शाम को और भी रूमानी बना दिया था ।

चाय आई... "जल्दी से पीले क्लास स्टार्ट होने वाली है " 

उसने चाय की पहली चुस्की लेते हुए कहा

 मैंने बस अनमने से सर हिला दिया ।



मैं नहीं चाहती थी यह चाय और ये शाम कभी भी खत्म हो ।किसी ना किसी बहाने से मैं उसके साथ वहीं बैठे रहना चाहती थी ।

"तेरी चाय ठंडी नहीं हुई अब तक मैंने तो कब की पी ली" 

उसने थोड़ा चिढ़ते हुए कहा... 

"मेरे से नहीं पी जाती गरम-गरम चाय" मैंने बहाना बना दिया 

नहीं  " तो पहले बताना था हम आइस टी मंगा लेते"

वो थोड़ा sarcastic way में बोला But i love sarcasm 

क्या है यार मैंने बस नाराज होने का हल्का सा नाटक किया पर मैं उस वक्त को, उस शाम को, उसकी कंपनी को इंजॉय करने लगी थी 

अरे तो चाय तो.... 

जब इतनी ही ठंड लग रही थी तो जल्दी से पी नहीं सकती थी क्लास स्टार्ट हो गई होगी 


बस अब मेरा पारा चढ़ गया 

"भाड़ में गई चाय अब तुम क्लास ही चलो"

 मैंने कप टेबल पर रख दिया

 "अरे तो इसमें इतना गुस्सा होने वाली कौन सी बात है" 


"नहीं अब तुम बस क्लास चलो"


"अरे चाय तो खत्म कर"


चाय मेरे इंतजार में रही और मैं बैग उठाकर वहां से चल दी पीछे -पीछे वो भी आ गया

 देखा कि सारे स्टूडेंट्स रूम के बाहर कोऑर्डिनेटर से लड़ रहे थे 


"क्या हुआ क्लास स्टार्ट नहीं हुई अब तक"

 उसने पूछा (जिसे क्लास के सिवा कुछ दिख ही नहीं रहा था

 न मै, ना मेरी बची हुई चाय )


"अरे नेटवर्क प्रॉब्लम है भैया नहीं चल रही तो अब मैं क्या करूं"


"चलो अब यह भी ठीक है"


"क्या यार इससे अच्छा तो हम आराम से बैठ कर चाय पी लेते"

 उसने मेरी ओर धीरे से देखते हुए कहा...

 मैंने भी उसकी तरफ गुस्से में घूर के देखा और

 मेरी बची हुई चाय हम दोनों को देख कर मुस्कुरा दी ।

कुछ इस तरह 

साल की आखिरी शाम चाय के दो कप के साथ खत्म हुई। 


© Apurva Gupta

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