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रचना काव्य की

तुम खुद एक काव्य हो
और काव्य की रचना करना कितना अच्छा होता है न,
न जाने कितने सवालों के घेरो से तुम्हें होकर जाना होता
सबका ख्याल रखना होता ,
खुद का भी और काव्य का भी
देखो तो कितना सुंदर लगता
जब कोई काव्या, एक काव्य के रचना करती है तो
मानो जैसे धरती पर चांद उत्तर आया हो
अच्छा सुनो,
तुम न ऐस ही लिखते रहना
रचना करते रहना
सबकी , अपनी
और मेरी भी ।
ये जो शब्दों से पिरोकर तुम एक
माला बनाती हो न
वो अपने आप मे ही एक अनूठा रचना होती है
और इस रचना को पढ़कर न जाने कितने लोग दोनों के दीवाने हो जाते है,तुम ऐसे ही रचते रहना,
गढ़ते रहना नई नई रचनाओ को अपने अंदर
और फिर एक नई काव्य की रचना करना।
ठीक है न ।

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