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चुपके से

अच्छा सुनो
ये जो तुम चुपके चुपके मेरे वॉल पढते हो न
इश्क़ की पहली सीढ़ी है
थोड़ा सम्भल कर चढ़ना
कही गिर गए न
तो .....
तो क्या...
तो मैं भी गिर जाऊंगी...
समझे तुम...
और हां सुनो.. जब एक बार आ जाओगे न तो जाना नही छोड़ कर....
वैसे भी सब चले जाते है ......
अगर तुम गए न तो मेरी साँसे भी लेते जाना ...
समझे तुम...

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जिंदगी

 सर पर बोझ डुबोकर ख़्वाब फटे एड़ियां,घिसकर चप्पल  लालन-पालन है ज़िन्दगी  बुन कर, सहेज कर तारीफ एक गलती पर  बदनाम होना है ज़िन्दगी थाम कर उंगली बांध कर कलाई विदा कर बिटिया  आँसू बहाना है ज़िन्दगी  इकट्ठा कर मेहनत को पोटली में बांध घर से धक्के खाना है ज़िन्दगी  भटकते राहों में ठोकर खाकर  बिना बेटे/बेटियों के हाथों अग्नि से प्यार होना है ज़िन्दगी । @tumharashahar

देवालय

 Pic-self click किसान की मेहनत, पसीने से सींचे  मिट्टी से बने, कलाकृतियों से सजे देवालय सा घर  जिसमें वास करती है देवी-देवता जिसे चढ़ता है पूंडरी जलते है दीपक  रात के समय चाँद की उपस्थिति में आँगन होती रौशन... बटोरने खुशियां  कभी लौट आना शहरों से तुम उस गाँव की तरफ जहां वास करती है आज भी संस्कृति, पवित्रता, अध्यात्म निश्च्छल प्रेम घर आँगन में । @tumharashahar0

क्या खुद को घिस कर कोई पापी हो सकता है ?

 Pic-@pinterest  क्या कोई खुद को घिस कर पापी हो सकता है ? तुमने नही देखा वो खेल जो तकदीर खेल रही तुम्हें दिखा सिर्फ प्यार भविष्य, खुद को समेट कर किसी पोटली में तुम बंध तो जाते थे लेकिन खुले कभी नही  गर कभी खुल भी सके तो खुलते-खुलते चमड़िया झूल गयी, हड्डियां दिखने लगी नही दिखा तो किसी को तुम्हारा संघर्ष लेकिन खुद को घिस कर तुमने  दुनिया को दिया नीलम, कोहिनूर जैसे अनमोल रत्न परन्तु उस पर भी सेंध लगायें गए जाति के नाम पर, तो कभी रंगों के नाम पर अंत मे तुम्हारे हाथ फिर से लगा वही उदासी, अकेलापन, घृणा, दोष  और राख  जो कभी प्रवाहित हो न  सकी गंगा में एक बार फिर तुम वंचित रह गए पवित्र होने से, वंचित रह गए तुम्हारे पाप धुलने से  लेकिन क्या खुद को घिस कर कोई पापी हो सकता है ? @tumharashahar0