आवारगी की भी हद थी
न तो अपना जाना न पराया
जिसने सिखाया था चलना
आज उसी की कर बैठा अवहेलना
मन की चेतना कही मर मिटी है उसकी
तभी तो पल पल आवारगी में
वो सब भूल बैठा है
कौन अपना कौन पराया
न तो अपना जाना न पराया
जिसने सिखाया था चलना
आज उसी की कर बैठा अवहेलना
मन की चेतना कही मर मिटी है उसकी
तभी तो पल पल आवारगी में
वो सब भूल बैठा है
कौन अपना कौन पराया
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