न जाने क्यूँ न चाहते हुए भी
खिंचा चला आ रहा तेरी ओर,
अपनी मंज़िल से भटकता हुआ,
ठोकर खाता हुआ,
कुछ अल्फ़ाज़ निकालते हुए,
तो कुछ रचना करते कविताओं की
जो अक्सर तेरे होने का सवाल छोड़ जाता है ।
खिंचा चला आ रहा तेरी ओर,
अपनी मंज़िल से भटकता हुआ,
ठोकर खाता हुआ,
कुछ अल्फ़ाज़ निकालते हुए,
तो कुछ रचना करते कविताओं की
जो अक्सर तेरे होने का सवाल छोड़ जाता है ।
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