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तुम्हारी याद में

क्या तुम मेरी कविता बनोगी,
क्या तुम मेरी ग़ज़ल बनोगी,
क्या तुम मेरी शायरी बनोगी,
या फिर यूं कहूँ
क्या तुम मेरी बनोगी,
क्या तुम मेरे संग संग चलोगी,
क्या तुम मेरी परछाई बनोगी,
या फिर यूं कहूँ
क्या तुम लता बन पाओगी,
क्या तुम नदी की धार बनोगी,
क्या तुम ठंड में सूर्य बनोगी,
या फिर यूं कहूँ ..........
मुझे अकेला तो छोड़ न जाओगी....
उसी अमावस्या की रात की तरह.....

क्या हुआ
कुछ तो बोलो प्रिये...
ऐसे कस्तूरी न बनो...
बात अंदर रखकर...
जगह जगह न ढूंढ़ते फिरो...
अपने मुख से ये राज़ तो खोलो प्रिये......
क्या तुम आओगी.....
मेरी कविता, मेरी ग़ज़ल, मेरी शायरी, मेरी परछाई बन पाओगी....

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जिंदगी

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देवालय

 Pic-self click किसान की मेहनत, पसीने से सींचे  मिट्टी से बने, कलाकृतियों से सजे देवालय सा घर  जिसमें वास करती है देवी-देवता जिसे चढ़ता है पूंडरी जलते है दीपक  रात के समय चाँद की उपस्थिति में आँगन होती रौशन... बटोरने खुशियां  कभी लौट आना शहरों से तुम उस गाँव की तरफ जहां वास करती है आज भी संस्कृति, पवित्रता, अध्यात्म निश्च्छल प्रेम घर आँगन में । @tumharashahar0

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