बाबा जो ऐसे देखन
मैं रोज़ पढने को जाई
उसे कितनी पीड़ा सही
ये एहसास मोहे रास न आयी,
मैं पढ़ के जग नाम कमाऊ
बाबा ये आश लगायी
उसे कितनी पीड़ा सही
ये एहसास मोहे रास न आयी।
मैं रोज़ पढने को जाई
उसे कितनी पीड़ा सही
ये एहसास मोहे रास न आयी,
मैं पढ़ के जग नाम कमाऊ
बाबा ये आश लगायी
उसे कितनी पीड़ा सही
ये एहसास मोहे रास न आयी।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें