वो लठ थी
वो हठ थी
वो मेरे मन की मठ थी
मठ में रहता था उसका प्रेम,
उसका जीवन रस,
मठ में रहता था एक योगी
जिसको प्रेम था उस मठ पर राज करती राजकुमारी से
धीरे धीरे ये बढ़ता गया निरंतर बिना स्वार्थ के
अनंत तक और मन के मठ में एक विशालकाय रूप बन बैठा था
उसकी हठ ,
उसकी लत
वो मन की मठ.....
वो हठ थी
वो मेरे मन की मठ थी
मठ में रहता था उसका प्रेम,
उसका जीवन रस,
मठ में रहता था एक योगी
जिसको प्रेम था उस मठ पर राज करती राजकुमारी से
धीरे धीरे ये बढ़ता गया निरंतर बिना स्वार्थ के
अनंत तक और मन के मठ में एक विशालकाय रूप बन बैठा था
उसकी हठ ,
उसकी लत
वो मन की मठ.....
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