मन एक समुंदर है जहाँ उथल-पुथल होते रहती है,
सोच की धारा बहते रहती है,
कभी तेज़ तो कभी धीमी रफ्तार पकड़े हुए,
एक दूसरे को बहाते हुए एक जगह से दूसरे जगह पहुँचते हुए, किसी तरह एकांत या
स्थिर होती है
और फिर एक नए सैलाब के तलाश में रहती है।
सोच की धारा बहते रहती है,
कभी तेज़ तो कभी धीमी रफ्तार पकड़े हुए,
एक दूसरे को बहाते हुए एक जगह से दूसरे जगह पहुँचते हुए, किसी तरह एकांत या
स्थिर होती है
और फिर एक नए सैलाब के तलाश में रहती है।
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