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संदेश

समझ रहे हो न तुम

मेरे हर अल्फ़ाज़ सिर्फ तुम्हारे लिए है...... समझ रहे हो न तुम देखो गुस्सा न होना मुस्कुरा देना मैं समझ जाऊंगा तुम तक पहुंच गई है मेरी बात हालात जो भी हो तुम अपने जगह सही , मैं अपने जगह देखो गुस्सा न होना मुस्कुरा देना मैं समझ जाऊंगा तुम तक पहुंच गई मेरी बात तुम जवाब में कुछ भी लिख दो मगर जवाब न देना ये शायद अच्छा न लगे या मना कर देना कि संदेश न दो मुझे देखो गुस्सा न होना मुस्कुरा देना मैं समझ जाऊंगा तुम तक पहुंच गई मेरी बात मेरे हर अल्फ़ाज़ सिर्फ तुम्हारे लिए है...... समझ रहे हो न तुम देखो गुस्सा न होना मुस्कुरा देना मैं समझ जाऊंगा तुम तक पहुंच गई है मेरी बात ~~~~मिन्टू

माँ प्रेम 2

तेरी आँचल की छांव में पला हूँ मैं टूटकर बिखरा नही हूँ मैं मज़बूत रहूँगा तेरी ही तरह क्योंकि तेरा ही वजूद हूँ मैं  - मिन्टू

माँ प्रेम 1

अभी तो टूटकर जुड़ना सिखा ही था की फिर से टूट गया, छलका जो आंखों से उसे घूट घूट कर पी गया, वैसे दफ़्न है सीने में कई अल्फ़ाज़ गर निकलने की कोशिश भी हुई मगर उसे भी दफ़्न कर गया, तू ये न समझना हुआ क्या है बस समझना शांत समंदर सा हो गया 

मुझे समझ पाती

तुम तो मुझे लेखक ही समझते रह गए शायद कभी मेरी शब्दों को समझा होता तो शायद मैं आज तेरे दिल के दरबार मे  तानसेन होता, तुम मुझे छेड़ पाती हर बार एक नया आलाप लगाती, तुम्हरा जब मन करता तो तुम मुझे सुन पाती गहराई से, मुझे समझ पाती मन की परछाई से । ~~मिन्टू

ज़िन्दगी एक सच्चाई

कल तक जो सुनाया करते थे ज़िन्दगी का सफ़रनामा वो आज सफर में हो गए, कल तक जिसे चाहा था सबसे ज्यादा वो आज नदारत हो गए, कल तक जो मुस्कुराते थे मेरी बातों से वो आज मुस्कान छोड़ गए, समझता था जिन्हें अजीज वो आज मतलबी हो गए, शायद ये ज़िन्दगी का सफर का सफ़रनामा ही तो है जो सीखा गए सत्य कथन शायद ये बात समझ आये देर से तुम्हे और यही सच्चाई भी है समझ रहे हो न तुम

एक सवाल

चलो दूरी ही सही अब तो सुकून से रह रहे होंगे न तुम इस सुनशान जगह छोड़ कर पल भर की खुशी पल भर का साथ पल भर का गम देखर, चलो दूरी ही सही अब तो खुश होंगे न तुम न तुम्हे कोई परेशान करेगा न ही सवाल का जवाब मांगेगा न ही बातें होंगी बोलो न चुप क्यों हो तुम ? चलो दूरी ही सही अब तो अपने मंज़िल को चुमोगे न तुम अपनी हस्ती तो बना लोगो न तुम बोलो न चुप क्यों हो तुम ?

एहसास

कभी उन सजती हुई दीवारों पर मेरी ज़िक्र तो हो, माँ हूँ तुम्हारी कभी तुझे मेरी फिक्र तो हो, अपनी ज़िंदगी जप तप से तुझपे कर दिया कुर्बान कभी तो उसकी भी इस पन्नो पर ज़िक्र तो हो, माना कि वो तुम्हारी हमसफ़र है, मगर इस सफ़रनामा का भी तो तुम्हे फिक्र हो कभी उन सजती हुई दीवारों पर मेरी ज़िक्र तो हो।