चलती बस, सुनसान सड़कें, हवाओं से बातें करता मेरा शरीर और मन
पल में उमड़ते ख्याल, दिखते हालात लोगों के
फागुन के धुन मन को करते तृप्त
वही बीच-बीच मे दस्तक देते क़ई सवाल
आखिर ये सड़क जाती कहाँ है
जिधर मैं जा रहा हूँ उधर या सड़क जिधर जा रही उधर जा रहा हूँ मैं ?
क्या ज़िन्दगी वीरान रातें लेकर गुज़ारी जा सकती है ?
पनपते खंडहर पर पौधें, रिसते पानी
ढहता ईंट, खुद का मिटाता अस्तित्व
आखिर इशारा किस ओर है समय का
क्या चाहता है ये समय मुझसे, तुमसे
धरती पर रह रहे सभी जीव-जंतुओं से ?
क्या इसका जवाब है किसी के पास ?
क्या हर सवाल का जवाब है ?
आखिर है तो किसके पास....

अति सुंदर
जवाब देंहटाएंबहुत सुन्दर 👌
जवाब देंहटाएंशुक्रिया
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