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रातें वीरान है !

 चलती बस, सुनसान सड़कें, हवाओं से बातें करता मेरा शरीर और मन

पल में उमड़ते ख्याल, दिखते हालात लोगों के

फागुन के धुन मन को करते तृप्त 

वही बीच-बीच मे दस्तक देते क़ई सवाल

आखिर ये सड़क जाती कहाँ है

जिधर मैं जा रहा हूँ उधर या सड़क जिधर जा रही उधर जा रहा हूँ मैं ?

क्या ज़िन्दगी वीरान रातें लेकर गुज़ारी जा सकती है ?

पनपते खंडहर पर पौधें, रिसते पानी 

रातें वीरान है !

ढहता ईंट, खुद का मिटाता अस्तित्व

आखिर इशारा किस ओर है समय का 

क्या चाहता है ये समय मुझसे, तुमसे


धरती पर रह रहे सभी जीव-जंतुओं से ?


क्या इसका जवाब है किसी के पास ?

क्या हर सवाल का जवाब है ?

आखिर है तो किसके पास....

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