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Deepu-memsaab

पहला भाग
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"मैमसाब नीचे उतरिए, नीचे चलिए,पाल टूट जाएगी खेत की तो पानी कैसे रुकेगा".
'ओफ्फो तुम्हें हर चीज़ से दिक्कत है, और भला ये मैमसाब क्यों बुलाते हो मुझे? मेरा इतना सुंदर नाम है। केवल इसलिए कि मैं शहर में रहती हूँ?'
.
"आप ही तो सिखाती हैं कि 'थैंक यु' के बाद 'योर वेलकम' और 'माय पेलज़र' बोलते हैं, तो हुई ना आप अध्यापिका, तो अध्यापिका को हम मैमसाब बुलाते हैं"
.
'तुम और तुम्हारे तर्क, खिल्ली उड़ाने को करते हो बस, और 'प्लेज़र' होता है, पेलज़र नहीं......अरे बाप रे! दीपू, इतने सारे बेर वह भी इतने लाल, मुझे बेर बहुत पसंद है मुझे बेर खाने हैं'
.
. "अरे मैमसाब आराम से, काँटे हैं चुभ जाएँगे, पीछे हटिए, मैं तोड़ता हूँ"
.
'अच्छा जी और तुम्हारे तो खैर से रिश्तेदार लगते हैं ये काँटे जो तुम्हें नहीं चुभेंगें, है न?'
.
. "हाँ बस यही समझ लीजिए, इन्होंने ही पाला है। अपना दुपट्टा फैलाओ, मैं तोड़-तोड़ कर डालता हूँ"
.
'अंधे हो गए हो? मैंने जीन्स पहना है' .
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"हाँ तो सूट पहना कीजिए न यहाँ आया करे तब तो। फबता है आप पर, खैर मेरे पीछे की जेब से रुमाल खींच लीजिए।".
.
.'मैं रुमाल कल धो कर लौटा दूँगी' .
.
"रख लीजिएगा मैमसाब, जब गुजरात में नौकरी से घर को लौटते बस में महँगी दुकानों के बेस्वाद व्यंजन के पैकेट बे मन से खाने पड़ेंगें, तब मेरे ये इश्क़ से लबालब लाल-लाल  बेर बड़े याद आएंगे, तब भी इस रुमाल में इन बेरों की खुशबू बरकरार रहेगी" ।



 दूसरा भाग
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 'दीपू....दीपू...दी...अरे बाप रे!...किवाड़ बंद नहीं रख सकते? कुंडी किस लिए बनाई है किवाड़ पर?'
.
"आ..आई  ए..म सॉरी, अब आ जाओ अंदर, वो... मैं..."
.
'क्या वो मैं वो मैं, और भी लोग रहते हैं इस घर में उनका लिहाज़ कर लिया करो'
.
"हाँ हाँ सारे लिहाज़ अदब मैं ही रखूँ मैमसाब, आप ना ग़लती से दरवाज़ा खटखटा देना कभी। और दस दिन के वेकेशन पर आने को घर में रहना नहीं बोलते"
.
'ये मेरा घर है, मैं कहीं भी आऊँ जाऊँ। बटन टेढ़े लगाए हैं'
.
''बटन टेढ़े ही लगते हैं जब कोई बे-धड़क्के से कमरे में घुस आए और बेशक़ पूरा बंगला आपका सही, ये कमरा मेरा है। बाक़ायदा हर महीने पैसे भरता हूँ मैं इसके।"
.
'ठीक है ठीक है, अम्मा बुला रही है ऊपर, खाना लगा दिया है'
.
"मैमसाब कभी हाथ ही बँटा दिया कीजिए उनका, अपने हाथ से कुछ बना कर खिला दोगे तो कुछ तो याद करेंगें आपके जाने के बाद"
.
"खीर बनाई है मैंने, वैसी जैसी तुम्हें पसंद है, ठंडी हो जाएगी चलो"
.
'हाहा... बना ही ना लें आप कहीं...अरे रुको...मैं दौड़ के आया अभी। केसर डाल देना खीर में'
.
"मैं ज़हर ना डाल दूँ?"
.

तीसरा भाग
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यहाँ ऐसे ही बिजली गुल रहती है क्या?'
.
"आपका शहर थोड़ी है मैमसाब, गाँव है हमारा"
.
'ये 'हमारा' से क्या तात्पर्य जनाब? 
ये गाँव जितना तुम्हारा है उतना ही मेरा भी है'
.
"खुशफ़हमी है आपकी"
.
'मेरी बेइज़्जती करने से फ़ुर्सत मिले तो मेरी मदद कर दे ना कंदील(लालटेन) ढूँढने में, माँ मंगा रही है और वैसे भी इस अंधेरे में उल्लुओं को बेहतर दिखता होगा'
.
"यहाँ रहो तो चीजों का अता-पता रहे ना, बाहर दालान में टकी है। तेल ख़त्म हो गया होगा, आपको तो डालना आता नहीं होगा, माँ से कहिएगा डाल देंगी'
.
'माँ?'
.
"हाँ ग़लती से निकल गया, और क्या हो गया, क्या मैं उन्हें माँ नहीं बुला सकता? क्या आप मुझे परिवार नहीं समझती?'
.
'ह्म्म्म समझती तो हूँ.... परंतु रिश्ता नहीं जानती'
.
"हर रिश्ते को नाम देना ज़रूरी भी तो नहीं"
.
' हद से ज़्यादा सिनेमा देख-देख कर लोगों का दिमाग़ ख़राब हो गया है, डायलॉग बाज़ी ख़त्म नहीं होती।
 कम बोला करो थोड़ा मेरे सामने समझे?'
.
"हाँ मैं भूल गया था कि मिनिस्टर लगी हुई हो आप यहाँ"
.
'वो भी लग जाऊँगी किसी दिन। अभी चलो माँ इंतज़ार कर रही है'
.
" हाँ चलो, 'माँ' इंतज़ार कर रही है"।




                 चौथा भाग
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'दीपू यह क्या कर रहे हो?'
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"इमली के पत्ते तोड़ के लाया हूँ, चटनी बना रहा हूँ। 
आपकी पसंदीदा है ना"
.
'हाँ ठीक है लेकिन घर में ग्राइंडर और हमाम-दस्ता दोनों रखे हैं,
 तुम ये सिलबट्टे पर क्यों पीस रहे?'
.
"सिलबट्टे पर पीसी चीज़ों का स्वाद ही अलग होता है मैमसाब, 
दोगुना हो जाता है चीजों का स्वाद इस पर।"
.
'क्या कुछ भी तर्क लगाते हो'
.
"कुछ भी तर्क नहीं है यह, इसकी बनावट ही कुछ ऐसी है, इसके खुरदुरेपन से मसाला इसमें जम सा जाता है, पिछली पीसी गई हर चीज़ का स्वाद ये थोड़ा-थोड़ा स्वयं में समेट लेता है"
.
'ह्म्म्म इसका मतलब ये धुला हुआ नहीं है, अपनी पंचायत बंद करें और पहले शांति दीदी से कहें इसे धो दे'
.
"हे भगवान! कोई लॉलीपॉप खाता बच्चा समझ जाए पर इनके समझ ना आए बातें। सिल धुला हुआ ही है। कुछ-एक चीज़ें अरसों तक अपना अस्तित्व दर्ज रखती है किसी दूसरी वस्तु पर। कुछ चीज़ें स्पर्श मात्र से लिपट जाती है आपसे और सरलता से नहीं छूट पाती, मसलन(example)
केसर का रंग,
चंदन की खुशबू ,
बारिश की सिलन,
आपकी यादें....."
.
'क्या??'
.
"वो... म...म..मेरा मतलब आप सभी की यादें, आप सब के चले जाने के बाद ये यादें अरसे तक लिपटी रहती है मुझसे। दालान में बैठता हूँ तो बगल से आवाज़ आती है छन-छन जैसे चाची पास बैठे गेंहूँ साफ़ करने में लगी हैं, थोड़ी दूर पर सुनाई आती है उस कतरन की आवाज़ जो चाचा के मेहंदी के पौधे की छंटाई करते हुए आती है और घर के ऊपरी हिस्से में गूँजती आपके सूफ़ी गानों की धुन जो इंसान को सुकून से भर दे.."
.
'मम्म्म्म... बहुत अच्छी है, मज़ा आ गया, दिल ही ख़ुश कर दिया तुम ने तो।'
.
"क्या🙄?"
.
'अरे चटनी और क्या? बहुत स्वादिष्ट बनी है। माँ को चखा के आती हूँ।'
.
(ये लड़की ज़िन्दगी भर ऐसी ही रहेगी क्या🤦)-------------


पाँचवा भाग
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पाँचवा भाग:- "दीपू वहाँ उस सामने वाले पत्थर पर जा कर बैठो, जाओ यहाँ से"
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'हद्द है मैमसाब मैं आपको तंग थोड़ी कर रहा हूँ, मैं कुछ बोलूंगा भी नहीं कसम ले लें। मैं देखना चाहता हूँ आप क्या लिख रही हैं।'
.
"दीपू मुझसे ऐसे नहीं लिखा जाता, मुझे एकांत चाहिए। जब पूरा होगा तो बेशक़ पढ़ा दूँगी। अभी जाओ"
.
'मैमसाब आप मेरे बारे में कोई कहानी क्यों नहीं लिखती?'
.
"😂😂कहीं पागल वागल तो नहीं हो गए हो? 
या सर में कहीं चोट आई है, दिखाओ"
.
'भगवान जाने हर बात पर इतना कैसे हँस लेती हो, भला इसमें पागल होने की क्या बात है? आप तो सब कुछ लिख सकती हैं, मुझ पर क्यों नहीं?'
.
'कुछ तो ख़ास होना चाहिए न लिखने के लिए? तुम में कौनसी ऐसी ख़ासियत है भला जिस पर में लिख सकूँ? पाओपोले से तुम लगते हो, हर वक़्त ये बिखरे बाल, शर्ट आधा वक़्त एक तरफ़ से बाहर को झांकती रहती है। हरकतें तुम्हारी जानवरों जैसी है, नदी में मुँह दे कर पानी भला कौनसा इंसान पीता है? गाँव भर के जानवरों के तुमने नाम रखे हुए हैं, रस्ते चलते तुम्हें हर बकरी, घोड़े,तीतर, बटेर से बातें करनी होती है और ताज्जुब की बात यह है कि वे भी तुम्हारी बातों में हामीं भरते जाते हैं। दोनों पैर, पेट से सटा कर कछुए की तरह तुम सोते हो, दुनिया भर में किसी के बाप से डरते नहीं लेकिन आँखें बंद करने से सहम जाते हो। और ये चाय में बॉर्नविटा मिक्स कर भला कौन पी.....'
.
"😂 😂񘰾񘴮 मैमसाब मैमसाब ब्रेक पर पैर तो रखो, साँस ले लो थोड़ी🤣🤣"
.
'मैंने ऐसा कौनसा चुटकुला सुना दिया जो इतनी हँसी आ रही तुम्हें?'
.
" मेरी ख़्वाहिश थी कि आप मुझ पर कोई कहानी लिखते, मैं ये नहीं जानता था कि आप तो मुझ पर कभी न ख़त्म होने वाली क़िताब लिख सकते हो"
.
'मैं ही चली जाती हूँ दूसरे पत्थर पर, तुम्हारे कान पर तो जूं रेंगने से रही' ( आया बड़ा क़िताब लिखाने वाला) .


 छठा भाग
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 'दीपू बेटा आज फैक्ट्री से जल्दी आ जाना, इस लड़की को मंदिर ले जाना है तुम्हें'
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"चाची मैं नहीं ले कर जा रहा उन्हें वहां, उस रास्ते में गड्ढे आते हैं बहुत और ये सारे रास्ते चिल्लाती रहती हैं। मुझे गड्ढों में गिर के मौत न आए लेकिन मैमसाब की आवाज़ से हार्ट अटैक आ जाता है"
.
'कौन मैमसाब?'
.
"मेरा मतलब आपकी सुपुत्री"
.
'नाम है उसका कुछ, ये मैमसाब किन चक्करों में बुलाते हो?'
.
"हाँ चाची डब्बू, यही न बुलाते हो आप सब उनको? चाची उन्होंने ही कहा है मुझसे कि तुम मेरे घर में रहते हो तो मुझे मैमसाब बुलाया करो और यह कि उन्हें अच्छा लगता है जब उन्हें सब मैडम-मैडम कर के बुलाते हैं। यह तक कहती हैं कि मुझे ग़लती से कभी नाम से बुलाया तो मेरी ख़ैर नहीं"
.
'आने दो इस लडकी को आज, ज़्यादा हवाओं में रहती है। प्राइम मिनिस्टर लगी हुई है ये? ढाई और डेढ़ ये तुमसे पूछती है और तुम इसे मैमसाब कह के पुकारोगे'
.
"वही ना चाची, आप अच्छी क्लास लेना आज।
वैसे इन्हें मंदिर क्यों जाना है? मेरे ख़्याल में ये ईश्वर में मानती नहीं"
.
'इसके मन की ये ही जाने, दुनिया के सात अजूबे की मिट्टी इकट्ठी कर के भगवान ने इसको गढ़ा है। कहती है वहाँ इसकी रूह को चैन मिलता है, वहीं जा कर लिखती है। बोलती है वहाँ का 'aura' और 'vibes' बहुत सही है, अब इसकी अम्मा पढ़ा गई है मुझे इतनी अंग्रेजी जो मुझे 'aura' और 'vibes' का मतलब पता होगा'
.
"चाची बड़ी चालाक हैं आप, असल बात तो आपने बताई नहीं। सब कुछ न सही पर कुछ-कुछ तो हमें भी बताती हैं मैमसाब"
.
'क्या बोले जा रहे हो?'
.
"यही कि आपकी और चाचा की पहली मुलाक़ात भी तो उसी मंदिर में हुई थी न? इसीलिए उन्हें वहाँ जाना पसंद है"
.
'इतनी बातें करना कौन सीखा देता है बच्चों को पता नहीं। जाओ फैक्ट्री के लिए लेट हो रहा है, दादा की डाँट सुन नी है क्या?'
.
"हाँ चाची जा रहा हूँ, पता नहीं बड़े लोगों को इतना शर्माना कौन सीखा देता है। चाची वैसे वो गाना बहुत अच्छा लगता है मुझे"
(इश्क़ छुपता नहीं छुपाने से....ला ला लाला ला ला)

सांतवा भाग
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उतावले तो ऐसे हो रहे हो जैसे ख़ुद की शादी हो। मुझे नहीं आता यार ये सब, माँ क्या पकड़ा के चली जाती है, मेरे हाथ नहीं पहुँच रहे पीछे मैं कैसे बाँधू डोर को?"
.
'मुझे नहीं मालूम, पाँच मिनट में बाहर आओ नहीं तो मैं चला और आप मक्खियां मारना यहाँ अकेले बैठे बैठे, वैसे ही लेट हो चुके हैं, चाची सबके सामने मुर्गा बना देंगी वहाँ'
.
"हिम्मत है तुम्हारी मुझे अकेले छोड़ कर जाने की? यार नहीं हो रहा ये, अंदर आ कर बांधो इसे नहीं तो मैं पतलून पहन कर चल पड़ूँगी। और अगर माँ खड़े-खड़े हम दोनों को निगल गई तो फिर ना कहना की मैंने पहले बताया नहीं था"
.
'म..म..मैं कैसे?'
.
"क्या मैं कैसे। सब पहन ओढ़ के खड़ी हूँ मैं, इतना ड्रामा करने की ज़रुरत नहीं है, तुम्हें केवल ये ब्लॉउस की ऊपर वाली डोरी बांधनी है।"
.
'मैमसाब आप जानती हैं मेरे से जूते के फीते ठीक से नहीं बंधते मैं....'
.
"ठीक है माँ को फ़ोन करके बोल दो फ़िर की डब्बू थोड़ी देर के लिए ज़हर खा कर मर गई है तो हम आज नहीं आ सकेंगें"
.
'क्या तो बातें करती हैं आप। ठीक है आ रहा हूँ मैं अंदर'
.
"थैंक गॉड, मुझे लगा इनविटेशन कार्ड छपाना पड़ेगा"
.
'किधर है डोरी, कौनसी वाली?'
.
"दीपू के बच्चे आँखें खोलो अपनी तब तो कुछ दिखेगा। ये ऊपर, ये वाली"
.
'अच्छा इसको पहले ऐसे करना है, फिर ये दूसरी वाली को.....'
.
"दी...पू.. हटो हटो, दूर जाओ यहाँ से"
.
'अरे चिल्ला क्यों रही हैं इतना, कान के पर्दे फाड़ दिए मेरे'
.
"तुम्हारा हाथ छुआ"
.
'ठीक है मैं पैर से बांधने की कोशिश करता हूँ फिर??🙄😣' .
.
"नहीं मैं.. नहीं, ऐसे.. नहीं। मेरे हाथ पैर ठंडे पड़ गए यार, ये देखो रोंगटे खड़े हो गए सारे। बिना छुए बाँधना है तो बांधो"
.
'मैं मरे जा रहा हूँ आपको साड़ी में देखने के लिए? मैं जा रहा हूँ आपके नख़रे ख़त्म नहीं होते। डाँट पड़ेगी चाचा-चाची की सो अलग। दो मिनट, बस दो मिनट में तय करो आपको क्या पहनना है। पजामा पहनना है पहनो, साड़ी पहननी है तो मैं ठीक आपके पीछे खड़ा हूँ।'
.
"अच्छा दो मिनट दो"
.
.
.
.
.
.
(लो आ गए दोनों, हाए मेरी बच्ची, किसी की नज़र न लगे)
(अरे वाह थारी बेटी तो घणी चोखी लाग री स साड़ी म)
(डब्बू तो रंग गई जी गाँव के रंग में)
(आज लाग री स अट्ठे गांव की छोरी तू)



                  आठवाँ भाग
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 'क्या कर रहे हो?'
.
"काम ही कर रहे हैं कुछ। आपकी तरह आराम नहीं फरमा रहे। क्यों चाची सच कहा ना?"
.
'यहाँ भी काम ही करना है तो गुजरात से भला यहाँ छुट्टी बिताने क्यों आती इतनी दूर'
.
"मांडना मांड रहे हैं, आओ बैठो और सीखो कुछ"
.
'इसमें सीखना क्या है? चित्र बनाने में वैसे भी माहिर हूँ मैं। अव्वल आती थी हर जगह इन मामलों में'
.
"यहाँ आपकी कॉपी पैन पेंसिल नहीं है जो ग़लती कर दोगे तो मिटा दिया जाएगा या पन्ना फाड़ दिया जाएगा। चित्त लगा कर बनाना पड़ता है नहीं तो दीवारें ख़राब हो जाती हैं, इस कूपी को पकड़ना आसान नहीं है। ख़ैर, जिनका दिल दिमाग़ छलांगे मारता फिरे पल-पल उनके बस की नहीं है, दिमाग़ी तौर पर इंसान को स्थिर होना पड़ता है इसके लिए"
.
'तुम्हें पता है दीपू अगर इंसान की शक्ल अच्छी ना हो तो कम-स-कम उसे बातें ही अच्छी कर लेनी चाहिए?'
.
"ठीक है फिर बनाइये, एक अरसे ही सही आपकी कोई छाप इस घर पर रहेगी आपके बाद"
.
'ब्ला...ब्ला..ब्ला...सबसे सुंदर मेरा होगा देखना। अरे... माँ ने कितना सुंदर बनाया है, माँ के पास जाती हूँ।'
.
.
🌸
"कैसा लग रहा है डब्बू ज़रा बताना"
.
' माँ आप कुछ बनाओ और बुरा हो सकता है भला? आपकी तरह ख़ूबसूरत है यह। माँ ये केवल लाल और सफ़ेद ही क्यों?'
.
" पहले ज़माने में कहाँ रंग हुआ करते थे बेटा, सो ये लाल रंग जिसे गेरू से बनाया जाता है और यह सफ़ेद चावल के आटे से। तुम चाहो तो और रंग भर दो"
.
' नहीं माँ, और रंग के लिए रंगोली है ना। इसमें दो रंगों का मेल ही अच्छा है, नहीं तो इसका अस्तित्व कहाँ रह जाएगा।'
.
"चलो तुम दोनों बनाओ, मैं कुछ देर में आती हूँ। और हाँ ध्यान रहे, तुम दोनों के नौक-झोंक का एक छींटा भी इस पर पड़ा तो सारे मांडने फिर तुम दोनों के पीठ पर डंडे से माँडूंगी मैं, जो शुरू में लाल होंगे और अगली सुबह नीले नज़र आएंगे।"



नवां भाग
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'पता नहीं माँ ने तुम्हें क्यों भेज दिया मेरी पूँछ बना कर, सब्ज़ी ही लानी थी, मैं ले आती'
.
"जैसे बड़ी आती है सब्ज़ी लेनी आपको। आलू टमाटर का दाम पता है? सारा बाज़ार उठा कर उनके सर पर ना मार दो इसलिए मुझे भेजा है साथ में"
.
'एक लप्पड़ पड़ेगा ना तो सारी होशियारी नाक के रास्ते से बाहर आ जाएगी'
.
"हाँ मैं भी वही सोच रहा था क्यों भेजा है चाची ने। भिंडी जैसी ख़ुद हो, करेले जैसी आपकी ज़बान है, कद्दू जैसी शकलें बनाती रहती हो, सब्जियों की कमी थोड़ी न है"
.
"ज़बान चलाने से अच्छा है हाथ पैर चलाओ और जल्दी चलो यहाँ से, मुझे और भी काम है"
.
'अरे परवल वो रहे। आपको पसंद है ना, मैं ले कर आता हूँ'
.
"नहीं मैं बोर हो गई खा-खा कर"
.
'पसंदीदा चीज़ों से भी बोर हो जाते हैं क्या?'
.
"हाँ तो यह तो स्वाभाविक है, तुम क्या तीनों पहर दाल-पालक खा सकते हो? कोई कब तक एक ही चीज़ को देखा करे? कोई कब तक एक ही चीज़ को खाया करे? "
.
'तो क्या यह इंसानों के साथ भी होता है?'
.
"होता होगा... कोई किसी को पसंद करता है, प्रेम करता है तो वो सारा दिन उसके प्यार के सदक़े देते फिरते हैं और फिर कुछ सालों में सारे सदक़े धुँआ हो जाते हैं। फ़िर लड़ते-मरते रहते हैं सारा दिन एक-दूसरे से"
.
'तो यह भला किसने कहा कि लड़ने झगड़ने से प्यार ख़त्म हो जाता है? हम तो अपनों से ही लड़ते हैं ना? हम-तुम.. मेरा मतलब आप और मैं तो बचपन से लड़ते आ रहे हैं?'
.
"क्या मतलब? कहना क्या चाह रहे हो? वैसे भी तुम तो हो ही मेरे जन्मजात के दुश्मन, लड़ोगे नहीं तो क्या करोगे"
.
'कुछ नहीं... यह कह रहा था कि आपके लिए सब्ज़ी लेनी की क्या ज़रूरत है? सारी उम्र तो घाँस खाती आई हो। मजाल है कोई बात समझ आ जाए आपके।'
.
"अरे दीपू रुको तो, कहाँ भागे जा रहे....... खा कर तो देखना, घाँस खाने के अलग मज़े हैं ।

             
                           दसवाँ भाग
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'दीपू मुझे ना चाय पीने की इच्छा हो रही है'
.
"ह्म्म्म, मुझे भी। मैमसाब दो कप बना लेना"
.
'दीपू तंग मत करो, मेहंदी लगी है हाथों में, मैं नहीं बना सकती और पहले तो ये मैमसाब कहना बंद करो, ज़हर लगते हो मुझे जब मैमसाब बुलाते हो'
.
" तो नागिन को भला कौनसा ज़हर चढ़ता है? सुना है कभी?"
.
' चीनी इस डब्बे में है, चाय पत्ती वो ऊपर वाले में और दूध फ्रीज़ में रखा है, दूध उबालो और फिर चीनी फिर पत्ती डालो। चलो शाबाष काम पे लग जाओ '
.
" अच्छा जी अब आप हमें चाय बनाना सिखाएंगी?
 याद है चाय बनाना आपको मेरी माँ ने सिखाया था ? 
एक दोपहर आप चाची से बगैर पूछे मेरे घर दौड़ी चली आई थी और माँ चाय बना रही थी और उन्होंने आपको....." .
.
' हाँ उन्होंने मुझे दो मिनट चाय संभालने को बोला और मैं चाय को तब तक हिला रही थी जब तक चाय पत्ती गायब न हो जाए चीनी की तरह। यही ना? ठीक है बुद्धू थी तब मैं, कितनी बार मज़ाक बनाना है तुम्हें इस पर? और उस दिन मैंने उनसे चाय बनाना सीख लिया था '
.
" नहीं बस वो.... मैं अक्सर ज़िद करके इसलिए आपसे चाय बनवाता हूँ। आपके हाथ की बनी चाय में अब भी माँ की सीख का स्वाद और उनकी डाँट की ख़ुश्बू आती है। माँ की और माँ के हाथ की चाय याद आती है कभी-कभी। "
.
' लाओ चीनी का डब्बा दो इधर और जाओ दूध ले कर आओ फ्रीज़ से'
.
" डब्बू तुम ये क्या..... "
.
' डब्बू??? Did you just called me Dabbu?
.
" हाँ वो.... मैं... तुमने मेहंदी क्यों धो दी?"
.
' क्योंकि चाय मैं बना रही हूँ, पीछे हटो। और वैसे भी तुम्हारे हाथ की चाय ख़ास पसंद नहीं मुझे '
.
" तुमने मेरे गाल पे मेहंदी लगा दी "
.
' रंग ही चढ़ेगा, मरोगे नहीं उससे '
.
" रंग तो चढ़ चुका है "
.
' तुम और तुम्हारी बातें.... लाओ चीनी का डब्बा दो पीछे से '



                ग्यारहवाँ भाग
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आ जाओ दीपू, दरवाज़ा खुला है'

"क्या कमरे में बैठी हो मैमसाब तब से"

'क़िताब पढ़ रही हूँ, दीपू'

"और कोई काम नहीं है?"

'तो और क्या कंचे खेलूँ तुम्हारे संग? क्या काम है बताओ जल्दी और दफ़ा होव यहाँ से'

"अरे कुछ काम नहीं है, मैं फैक्ट्री से जल्दी आ गया था तो बस बोर हो रहा था" 

'हाँ तो मैं क्या मिस्टर बीन हूँ?तुम्हारा मनोरंजन कराऊँ?'

"एक भी बात का सीधा जवाब है आपके पास?"

'है ना। लेकिन वो सीधे लोगों के लिए बचा के रखे हैं मैंने। तुम जैसे बागड़बिल्लों के लिए नहीं'

"अरे बंद करो भई क़िताब। मैं आपको अपना कुआं दिखाने ले चलता हूँ और अपने खेत भी, आपने देखे नहीं होंगे काफ़ी समय से, क्या पीले-पीले दुपट्टे सी सरसो लहरा रही है वहाँ। 
लाओ इधर दो किताब मुझे..."

'दीपू, आराम से। गिर गई देखो किताब, सब सामान गिर गए इसके।'

"सामान नहीं, फूल कहते हैं इन्हें, वह भी सूखे हुए गुलबहार के फूल, जो की मेरे ख़्याल में पिछले जून की एक शाम को अपने कुएँ की पाल पर बैठे मैंने आपके सुपुर्द किए थे।" 

'दिए नहीं थे जबरदस्ती खोंस दिए थे मेरे कानों के पीछे'

"फ़िर जबरदस्ती के फूलों को क्यों सहेज कर बैठी हो?"

'पसंद है मुझे गुलबहार के फूल'

"अरे अरे आहिस्ता आहिस्ता,नाहक गुस्सा क्यों देवी जी? मैंने यह तो नहीं कहा कि फूल देने वाला पसंद है" 

'बकवास नहीं करो और काम करने दो मुझे'

"...अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें 
जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें.. "

'अहमद फ़राज़' 

"हाँ आपके पसंदीदा शायर हैं तो क्या हुआ कुछ एक शें'र हमें भी याद हैं उनके, सूखे फूल देख कर याद आ गया। चलो मैं नीचे इंतज़ार कर रहा हूं तैयार हो कर आ जाओ"

'मैं नहीं चलूँगी तुम्हारे साथ, तुम बैलों की तरह हाँकते हो गाड़ी, चालीस बार तो ब्रेक लगाते हो '

"गांव की डगरिया है मैमसाब, आपके शहर के हाइवे तो नहीं, चालीस गड्ढे भी आएंगे और चालीस बार ब्रेक भी लगाने पड़ेंगे। चिल्लाती ऐसे हो जैसे मैंने गाड़ी दीवार में दे मारी हो "

'मुझे कोई शौक नहीं है तुम्हारे साथ लॉन्ग ड्राइव पर जाने का'

"हाँ तो मुझे भी कोई शौक नहीं है आफत पीछे बिठाने का। चाची का कॉल आया था खाना आज फार्म हाउस पर बनेगा। और बोलीं की डब्बू को ले आना। अभी चलना है तो चलें नहीं तो मैं सुबह चिड़ियों को डालने के लिए दाना लाया था वही चुग कर सो जाना।"

'किसी दिन सिर फूट जाना है तुम्हारा मेरे हाथों।'

"जा रहा हूं गाड़ी की चाबी लेने आया था यहाँ, और आप चल रही हैं या फिर दाना..."

' गाड़ी मैं चलाऊंगी चलो'

"अरे मैमसाब रुकें तो, हमें फार्महाउस जाना है अस्पताल नहीं' ।

©रंगरेज़िया 
दिव्या मीणा
Instagram- @rangreziya







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जिंदगी

 सर पर बोझ डुबोकर ख़्वाब फटे एड़ियां,घिसकर चप्पल  लालन-पालन है ज़िन्दगी  बुन कर, सहेज कर तारीफ एक गलती पर  बदनाम होना है ज़िन्दगी थाम कर उंगली बांध कर कलाई विदा कर बिटिया  आँसू बहाना है ज़िन्दगी  इकट्ठा कर मेहनत को पोटली में बांध घर से धक्के खाना है ज़िन्दगी  भटकते राहों में ठोकर खाकर  बिना बेटे/बेटियों के हाथों अग्नि से प्यार होना है ज़िन्दगी । @tumharashahar

साल की आखिरी चाय

साल की आखिरी चाय हम उस वक्त मिले जब मुझे प्यार की ना तो जरूरत थी  नहीं प्यार से नफरत  लेकिन हमारी स्टोरी कुछ वैसी है  कैजुअल फ्रेंड्स थे  फिर क्लोज फ्रेंड्स हो गए  बेस्ट फ्रेंड्स हो गए   फिर लव स्टार्ट हो गया  यह किस्सा साल की आखरी शाम का है  हमारी दोस्ती को काफ़ी वक्त बीत चुका था  साल की आखिरी शाम जो सर्द थी  पर गुलाबी भी  हम कोचिंग के बाहर खड़े थे,  क्लास शुरू होने में पंद्रह मिनट बचे थे  मेरे हाथ हमेशा की तरह ठंडे और बिल्कुल सुन्न थे । "चाय पियेगी... चलते चलते बस यूं ही पूछा उसने हां...  मैंने फट से जवाब दिया  जैसे कि मैं बस उसके पूछने के इंतजार में थी  हम एक दूसरे के सामने बैठे हैं अदरक के साथ चाय की महक हवा में घुलने लगी  "अरे जल्दी कर दो भैया" ... उसने मेरे हाथ अपनी गर्म हथेलियों में थामते हुए कहा । मुझे कोई जल्दी नहीं थी । बैकग्राउंड में बज रही गाने ने  "सोनिए हीरिए तेरी याद औंदिए, सीने विच तड़पता है दिल जान जांदिए" उस शाम को और भी रूमानी बना दिया था । चाय आई... "जल्दी से पीले क्लास स्टार्ट ...