मैं जो भी लिखने जा रहा हूँ वो विकिपीडिया की सहायता से और अपने आस-पास के माहौल को देखते, सुनते हुए लिख रहा हूँ । इसमे बहुत सारे चीज़े ऐसे भी आएंगे जो कही न कही किसी न किसी रूप में कोई न कोई लिखा ही होगा फिर भी मेरी एक छोटी से कोशिश है।)
भोजपुरी- एक मिठास
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एक मीठी आस में
एक मिट्टी की प्यास में
लिख रहा हूँ माँ को
जो असम्भव है।
मातृभाषा सबके के लिए सबसे पहले अपनी क्षेत्रीय भाषा ही आती है उसके बाद हिंदी है जहाँ तक मैंने देखा है।
भोजपुरी नामकरण- बिहार में एक जगह है "भोजपुर" उसी के नाम पर इसका नामकण हुआ है जिसको राजा भोज ने बसाया था ।
(वैसे ये सब जानकारी आपको विकिपीडिया पर उपलब्ध है)
विशेष- भोजपुरी एक ऐसी भाषा है जिसमें एक अलग मिठास है, अलग रस है
या यूं कहूँ इसके बोलने सुनने से मन तृप्त हो जाता है ।
आप अगर बच्चे के मुख से सुनेंगे इसे तो उसका रस चौगुना बढ़ जाता है और आप ललायित हो जाएगें इसे बोलने ,समझने, सीखने के लिए ।
इसमे एक अलग किस्म का जादू है जो नशों में रक्त का संचार बढ़ा देता है , एक अलग ऊर्जा दे जाता है
तभी तो पूरी मांग रहती है भोजपुरी गानों की ।
लेकिन फूहड़ता के आगे असल मे इसकी खासियत कही न कही गुम होती जा रही है और इसके जिम्मेदार कही न कही हम है,आप है
क्यों कि गाने वही निकालते जो पसंद किया जाता
और मैं इसके खिलाफ हूँ।
मैं चाहता हूं कि "भोजपुरी" अपना पैर पसारे तो एक अदब , एक सम्मान के साथ पैर पसारे और कही न कही ये अलग छाप छोड़ी भी है ।
" पूरे विश्व मे करोड़ो की संख्या में बोली जाने वाली भाषा कोई आम भाषा नही हो सकती है।"
लेकिन कुछ लोगो की वजह से इसे ऐसे देखा और परोसा गया है जैसे ये कोई गाली है मगर एक बात बताते चले आपको इसके जैसी भाषा , मिठास, रस, ऊर्जा, सम्मान किसी मे नही ।
जब भी इस भाषा का नाम आया है सबसे पहले
"भिखारी ठाकुर" और "महेन्द्र मिसिर" का नाम ज़रूर आया है
ये दो ऐसे व्यक्तित्व है जिन्होंने ने अलग अलग रंग रूप में इसे सजाया है और परोसा है।
बात भिखारी ठाकुर की करे तो इनकी रचना
बिदेशिया, बेटी बेचना और ऐसे कई विशेष नाट्य प्रस्तुत किए गए है जो स्त्री को लेकर बहुत चर्चित में रहे है
और जिनको भोजपुरी का शेक्सपियर कहा गया है
वही महेन्द्र मिसिर की रचना एक अलग अनूठा रहा है जिसकी छाप,पहचान एक अलग ही रंग बिखेरती है।
"सुनने में ये भी रहा है कि भिखारी ठाकुर के गुरु महेन्द्र मिसिर रहें है" अगर महेन्द्र मिसिर न रहते तो भिखारी ठाकुर पनपते ही नही ।
इनकी विशेष रचना इतनी लोकप्रिय हुई है कि उनके बाद के गायक और आज के दौर के गायक उनकी रची गीत को एक नया आयाम दे रहे है।
उनकी रची गीत है जो मुझे बहुत पसंद है
मैं इसे बचपन से ही सुनता आ रहा हूँ …
1.अंगुरी में डंसले बिया निगनिया हे,
2.आधी-आधी रतिया के कुंहके कोयलिया,
3.पटना से बैदा बुलाई द नजरा गईली गुइयां,
4. पनिया के जहाज से पलटनिया बन के अईह पिया,
इनको गाया है शारदा सिन्हा, चंदन तिवारी, देवी, कल्पना।
ये सब गायक मेरी बहुत पसंदीदा है खासकर शारदा सिन्हा , चंदन तिवारी( अभी ये भिखारी ठाकुर जी रचना प्रस्तुत करती है )
भोजपुरी को एक विरासत देने के लिए भिखारी ठाकुर और महेन्द्र मिसिर जी को मेरा प्रणाम है..।
वही उसके बाद वाली पीढ़ी की बात करे तो
भरत शर्मा व्यास, शारदा सिन्हा, मनोज तिवारी,कल्पना, मालिनी अवस्थी, देवी,चंदन तिवारी, पवन सिंह, खेसारी लाल यादव अभी है ।
लेकिन जहाँ लोकगीत की बात आती है वहां
शारदा सिन्हा, भरत शर्मा व्यास, विष्णु ओझा
और भी बहुत सारे गायक है जिन्होंने ने बचा रखा है इसे
भोजपुरी को एक अलग मंच, सम्मान दिया है।
और मैं इन सबको को हृदय तल से नमन करता हूँ।
बात आजकल की करे तो सिनेमा और संगीतों में ऐसे रचनाकार और श्रोतागण मौजूद है जो भोजपुरी को
कलंकित करने का काम कर रहे
लेकिन मैं विनती करुंगा की
भोजपुरी की लोक-लज्जा आपके और हमारे हाथों में है
उसे बचाए, सँवारे, परोसे ताकि नई पीढ़ी के लोग समझ
सके कि
भोजपुरी एक मिठास वाली भाषा है उसका लेवल अलग है।
इसमे मिट्टी की खुश्बू है, अपनापन है, श्रृंगार है, रस है, प्रेम है, विरह-वेदना है, समर्पण है, त्याग है, बलिदान है
या सब मिलाकर कहूँ तो
"भोजपुरी मेरी माँ है " .
आइये इसे सजाए, सँवारे और परोसे ।
अगर कोई त्रुटि हुई है तो अज्ञानी समझकर क्षमा करें ।
🙏🙏
जय बिहार
जय भोजपुरी ।
©मिन्टू/@tumharashahar

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