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मुझे नही पता मैं ....

मुझे नही पता मैं क्या हूँ
लेकिन यकीन मानो मैं पूरा का पूरा गांव हूँ,
मैं कितने भी डिग्री ले लूं मगर मैं रहूँगा देशी ही,
मिट्टी का ही
शायद तुम मुझे अनपढ़,गंवार समझ लो
भला-बुरा कह लो
मगर यकीन मानो मैं
गाँव ही रहूँगा और रहना चाहूंगा
मुझे नही चाहिए ये टाइल्स वाली,
दिखावटी दुनिया
मुझे तो मेरी मिट्टी पसंद है,
बारिश की बूंदों के बाद का सौंधी खुश्बू,
शुद्ध हवा, पवित्र पावन जल,
संस्कृति,प्यार,सम्मान
यकीन मानो तुम सब भी एक दिन इसी गांव की पगडंडियों को चुनोगे
अपने आने वाले पीढ़ी को बताओगे
इस "मिट्टी की मातृत्व" को

मेरा यकीन मानो
तुम सब एक दिन शहर से हो जाओगे गाँव ।
©मिन्टू/@tumharashahar

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