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प्रेम में कुछ भी नही रहता

प्रेम में पुरूष का नही रहता कुछ भी
सब हो जाता है उस स्त्री का
और वो स्त्री हो जाती है
वहाँ के रह रहे पौधो, झरना, पेड़ से लटकते लत्तर का,
अपने जुल्फ का, फूलों पर बैठे तितलियों का
यहाँ तक कि खो जाती है उन तमाम ख्यालो में
जो काल्पनिक परिवेश में बुना गया है

वो स्त्री हो जाती है घुमंतू
 वक़्त-बेवक्त कही ठहरकर कुछ ख़्वाब बुनकर
फिर निकल पड़ती है किसी अन्य तलाश में
और ये तलाश जब तक जारी रहती है तब तक
उसे चैन या सुकून न मिल जाए

और वैसे भी प्रेम  में स्त्री को कहाँ मिलता है
चैन, सुकून,
वो तो निरंतर गढ़ते रहती है
सींचते रहती है
ढलते रहती है
अपने प्रेमी में
खुद को अलग कर
खुद को बना लेती है पुरूष । ©मिंटू/@tumharashahar

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