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वो पागल लड़की

पागल सी लड़की,
कोमल, नाज़ुक सी
आँखों से करती थी वो शिकार अपने महबूब का,
जुल्फों से फसा लेती थी,
करती थी होंठो से घायल
लफ़्ज़ों से चलाती थी खंजर अपने महबूब पर
वो पागल सी लड़की,
जब भी करती थी  सोलहों श्रृंगार
मचलने लगते थे सरफिरे आशिक़ मछलियों की तरह,
कोमल अदा की अदाकारा थी वो
जो सजाते रहती थी शब्दो से दिल की बात कोरे कागज पर,
जो लिखा करती थी अपने महबूब के नाम खत,
वो पागल सी लड़की,
कर देती थी अपनी मुस्कान से वार
होते थे कई कायल उनके
तो कई मर-मिटने को होते थे तैयार,
जब भी पहनती थी हल्की कोई रंग के वस्त्र,
भूल जाते थे सब कोई इश्क का मंत्र,
सुध-बुध खो जाते थे सब
जब देखा करते थे उसे राह में
थी वो अपनी शहर की एक कली
रहती थी गुमनाम
मगर उसके भी होते थे नाम कई के होंठो पर
तो कई के दिलो पर
वो पागल सी लड़की
आज भी किसी के इंतजार में
खोती जा रही है अपना वजूद,
अपना नाम,
अपना काम.....

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