उम्मीदों की गांठ बाँधे,
मंज़िल को चल दिये साधे,
टूटता ,
बिखरता,
तड़पता हुआ
फरेब की गलियों से होता
पहुंचा हुँ तुम्हारे पास,
और
तुम कहती हो
तुम किसी काम से नही ।
तमाम उम्र,
खुद को झोंक दिया इश्क़ की भट्टी में,
घूमता रहा तेरे इर्द-गिर्द तितलियों की तरह,
और
तुम कहती हो किसी काम के नही ।
कभी जो तुम्हे अकेला छोड़ गए थे सब
बस सहारा बना था मैं ,
अजनबी होकर भी अपना माना था तुम्हें
और
तुम कहती हो किसी काम के नही ।
~~मिन्टू
मंज़िल को चल दिये साधे,
टूटता ,
बिखरता,
तड़पता हुआ
फरेब की गलियों से होता
पहुंचा हुँ तुम्हारे पास,
और
तुम कहती हो
तुम किसी काम से नही ।
तमाम उम्र,
खुद को झोंक दिया इश्क़ की भट्टी में,
घूमता रहा तेरे इर्द-गिर्द तितलियों की तरह,
और
तुम कहती हो किसी काम के नही ।
कभी जो तुम्हे अकेला छोड़ गए थे सब
बस सहारा बना था मैं ,
अजनबी होकर भी अपना माना था तुम्हें
और
तुम कहती हो किसी काम के नही ।
~~मिन्टू

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें