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टूटते ख़्वाब

तुम्हारी तलाश में भटकता रहा राह गुजर बनकर,
हर तकलीफ, हर दर्द से अंजान होकर,
मिलो तक का सफर तय कर
आया  पास तेरे,
कई राते बीती है संग ,
कुछ ख्यालों के
कुछ उम्मीदों के तो
कुछ विश्वास के साथ,
न जाने ये अल्फ़ाज़ भी आज दगा दे रहे है
तुमसे मिलने के बाद
हम तन्हा , अकेले से हो गए,

क्यूँ ये वही प्यार है न
जो तुम पहले किया करती थी ?

क्यूँ आज ठोकर मार जला रही हो प्यार को
इस जेठ की दोपहर की तरह,

आज भी इतने तकलीफ देकर तुम्हे खुशियों से भेंट होती है न
तो ठीक है
मैं भी टूटकर बिखर जाऊँगा
टूटे कांच के तरह,
चूर चूर हो जाऊंगा ,
बिछ जाऊंगा तेरी राह में
उस टूटे फूल की तरह,
तब तो तुम्हे जाकर मुझपर विश्वास होगा न

की मेरा प्यार भी आज वैसा ही है
जो पहले हुआ करता था ।

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