सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

पिता

 पिता वो लहजा है

जिससे ढलता, गढ़ता  परिवार है

लिखने की शक्ति, जीने का सबक

बतियाने का ढंग और विचार हैं

सारी ऋणात्कमता एक तरफ

पिता की सहानुभूति एक तरफ

जिंदगी को पढ़ने, सीखने और लड़ने का सबक एक तरफ,

तो एक तरफ विश्वास 

स्थापित करने का जरिया,

न जाने कितने ही सीढियां चढ़े

लड़खड़ाते हुए

फिर ,

उनका हौसला एक तरफ,

एक तरफ तंज समाज का

तो एक तरफ प्यार पिता का,

एक तरफ जवानी तो

एक तरफ बुढ़ापे की लाठी,

सारे मसले एक तरफ

तो पिता का ज्ञान एक तरफ

एक तरफ  अकेले खड़ा रहने की शक्ति

तो एक तरफ सूखे आंखों में पानी ।


Insta -(ram_chourasia)

पिता by hare ram chourasia


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

जिंदगी

 सर पर बोझ डुबोकर ख़्वाब फटे एड़ियां,घिसकर चप्पल  लालन-पालन है ज़िन्दगी  बुन कर, सहेज कर तारीफ एक गलती पर  बदनाम होना है ज़िन्दगी थाम कर उंगली बांध कर कलाई विदा कर बिटिया  आँसू बहाना है ज़िन्दगी  इकट्ठा कर मेहनत को पोटली में बांध घर से धक्के खाना है ज़िन्दगी  भटकते राहों में ठोकर खाकर  बिना बेटे/बेटियों के हाथों अग्नि से प्यार होना है ज़िन्दगी । @tumharashahar

देवालय

 Pic-self click किसान की मेहनत, पसीने से सींचे  मिट्टी से बने, कलाकृतियों से सजे देवालय सा घर  जिसमें वास करती है देवी-देवता जिसे चढ़ता है पूंडरी जलते है दीपक  रात के समय चाँद की उपस्थिति में आँगन होती रौशन... बटोरने खुशियां  कभी लौट आना शहरों से तुम उस गाँव की तरफ जहां वास करती है आज भी संस्कृति, पवित्रता, अध्यात्म निश्च्छल प्रेम घर आँगन में । @tumharashahar0

प्रिये

वो मेरी सुर थी वो मेरी लय थी वो मेरी गीत थी मेरी संगीत थी, वो मेरी नृत्य थी मेरी नृत्यांगना थी, वो छेड़ जाया करती थी अक्सर मुझे मैं बन जाया करता था उसका वाद्ययंत्र, रम जाया करता था उसके संग-संग बनते-बिगड़ते एक नए सुर में पहचान बनती एक नए रंग रूप में ऐसी थी मेरी प्रिये