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सोच- गली की

मैं निकला था गलियों में
पहले जैसा दौर लाने को,
मगर बदनामियों के जंजीर ने मेरे
पैर जकड़ लिए,
सोचा
समझा दु उन्हें ,
हालाते-ए-मंजर शहर की
मगर सोचें-ए-परिंदे उनके उड़ते चले गए,
ऐसा नही की वो नासमझ है
मगर वो नासमझी के शिकार होते चले गए ।

~~मिन्टू

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